अब सुबह की पहली चाय, बच्चों का रात वाला दूध (Milk) का गिलास और घर में जमता दही, कर्नाटक के सभी परिवारों की दिनचर्या इन्हीं पर टिकी है। अब इसी दिनचर्या के दाम बढ़ने की आहट है। राज्य सरकार नंदिनी दूध की कीमत में 8 से 10 रुपये प्रति लीटर तक का इज़ाफ़ा करने की ओर बढ़ रही है।
मंगलवार की बैठक मे हाँ भी, पर अभी नहीं
राज्य मंत्रिमंडल की मंगलवार की बैठक में यह मुद्दा सबसे अहम रहा। सूत्रों के हवाले से बताया गया कि मंत्रिमंडल ने दाम बढ़ाने के पक्ष में राय रखी, पर अंतिम निर्णय चार विधान परिषद सीटों के चुनाव के बाद होने की संभावना है। यानी मंत्रियों की सहमति बन चुकी है, पर अधिकारिक घोषणा के लिए अभी इंतज़ार करना होगा।
बैठक के बाद सरकार की ओर से कोई औपचारिक जानकारी तो नहीं दी गई, क्योंकि अभी आचार संहिता लागू है। फिर भी कई मंत्रियों ने बताया कि मंत्रिमंडल बढ़ोतरी का पक्षधर है और अंतिम फ़ैसला लेने का हक़ मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को सौंपा गया है। इसका मतलब है कि दाम की घंटी कब बजेगी, यह अब मुख्यमंत्री और चुनावी कैलेंडर पर निर्भर है। एक रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री को चुनाव आयोग से औपचारिक अनुमति लेने का अधिकार भी दिया गया है।
जानिए दूध के दाम बढ़ाने की माँग कहाँ से उठी?
इस माँग की जड़ दूध उत्पादक किसानों के बढ़ते ख़र्च में है। कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (KMF) ने प्रति लीटर 10 रुपये की बढ़ोतरी माँगी है। फेडरेशन का कहना है कि चारा, पशु आहार और ढुलाई जैसी चीज़ों पर लागत काफ़ी चढ़ गई है। जिस किसान के गोठ में चार गायें बँधी हों, उसके लिए हर महीने का हिसाब अब पहले जैसा आसान नहीं रहा।
कुछ ही दिन पहले की रिपोर्टों में बताया गया था कि सहकारी दुग्ध संघों ने भी 8 से 10 रुपये की बढ़ोतरी सरकार के सामने रखी थी। तब मुख्यमंत्री ने लागत और दूसरे राज्यों के आँकड़ों का पूरा ब्योरा माँगा था। यानी फ़ैसला जल्दबाज़ी में नहीं, हिसाब-किताब देखकर आगे बढ़ा है।
सूखे की मार भी इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में है। मंत्रियों का तर्क है कि राज्य में जारी सूखे के बीच यह बढ़ोतरी डेयरी किसानों की आमदनी सुधारने में काम आएगी। जब खेतों में फ़सल कमज़ोर हो, तब पशुपालन कई घरों के लिए सहारा बन जाता है। सरकार का मानना है कि दूध के बेहतर दाम उस सहारे को टिकाए रखेंगे।
देखिये ख़रीद के आँकड़े क्या कहते हैं?
एक रिपोर्ट में दिलचस्प पहलू दिखा। बताया गया कि तीन महीनों में KMF का रोज़ाना दूध संग्रह 1.11 करोड़ लीटर से गिरकर 1.03 करोड़ लीटर रह गया। वजह यह बताई गई कि निजी डेयरियाँ कई बार किसानों को ज़्यादा भाव दे देती हैं, इसलिए दूध सहकारी संघों के बजाय वहाँ पहुँच जाता है। खरीद का दाम बढ़ाकर सरकार और फेडरेशन दोबारा किसानों का भरोसा और उनका दूध अपनी ओर खींचना चाहते हैं।
आम आदमी की जेब का गणित कैसा रहेगा
अब वह सवाल जो हर गृहिणी और दुकानदार पूछ रहा है: मेरे पैकेट का दाम कितना बढ़ेगा? एक रिपोर्ट के अनुसार अगर 8 रुपये की बढ़ोतरी हुई, तो नीले पैकेट वाला टोंड दूध 46 रुपये से बढ़कर 54 रुपये प्रति लीटर का हो जाएगा। 10 रुपये की बढ़ोतरी हुई तो यही दूध 56 रुपये के आसपास पहुँचेगा। मगर यह अभी अनुमान है, क्योंकि यह तय नहीं हुआ है कि हर श्रेणी का दूध कितना महंगा होगा।
असर सिर्फ़ दूध (Milk) के पैकेट तक सीमित रहने की उम्मीद भी कम है। उद्योग जगत की प्रतिक्रिया में कहा गया है कि दही और घी जैसे उत्पादों के दाम भी चढ़ सकते हैं। त्योहारों के मौसम में मिठाई और घर के पकवान पहले से महंगे पड़ते हैं, ऐसे में यह ख़बर रसोई के हिसाब को और भारी कर सकती है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि अलग-अलग रिपोर्टों में तस्वीर थोड़ी अलग है। ज़्यादातर रिपोर्टें कहती हैं कि मंत्रिमंडल ने 8 से 10 रुपये की बढ़ोतरी का समर्थन किया है और अंतिम मुहर बाक़ी है। एक रिपोर्ट ने 8 रुपये की मंज़ूरी बताई है और कहा है कि अमल आचार संहिता के कारण रुका हुआ है। इसलिए जब तक सरकार या KMF की ओर से आधिकारिक घोषणा न हो, पक्की रक़म और तारीख़ मानकर चलना ठीक नहीं।
फ़िलहाल गेंद मुख्यमंत्री के पाले में है। चुनाव निपटते ही सरकार नई दरों का ऐलान कर सकती है। किसानों को उम्मीद है कि इस बार बढ़ा हुआ दाम सीधे उनकी जेब तक पहुँचेगा। उपभोक्ताओं की चिंता यह है कि महंगाई की सूची में एक और चीज़ न जुड़ जाए।
कुल मिलाकर तस्वीर यह बनती है कि एक तरफ़ चारे के बोझ तले दबा किसान है और दूसरी तरफ़ हर महीने का बजट सँभालता परिवार। सरकार के सामने चुनौती दोनों के बीच संतुलन बनाने की है। अब देखना यह है कि अंतिम फ़ैसला किसके पलड़े को कितना भारी रखता है।
यह लेख के तथ्य ताज़ा रिपोर्टों से लिए गए हैं, नई दरें और लागू होने की तारीख़ आधिकारिक घोषणा के बाद ही पक्की मानें।

