भारत में दशहरा आमतौर पर भगवान राम द्वारा रावण-वध की विजय के रूप में मनाया जाता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर में यह पर्व पूरी तरह अलग रूप लेता है। यहां बस्तर दशहरा (Bastar Dussehra) मेला करीब 75 दिनों तक चलता है, रावण का पुतला नहीं जलाया जाता और उत्सव का केंद्र मां दंतेश्वरी की आराधना की जाती है।
यह उत्सव एक धार्मिक आयोजन है। यह बस्तर के पूरे क्षेत्र की आदिवासी परंपरा, सामूहिक आस्था, लोक-संस्कृति और सदियों पुरानी राजवंशीय विरासत का जीवंत संगम है।
बस्तर दशहरा का इतिहास कितना पुराना है?
बस्तर दशहरा का इतिहास करीब 600 साल पुराना माना जाता है। इसकी शुरुआत 15वीं सदी में बस्तर के काकतीय वंश के शासक राजा पुरुषोत्तम देव के काल में हुई बताई जाती है।
मान्यता है कि राजा पुरुषोत्तम देव ने मां दंतेश्वरी की कृपा और राज्य की सुरक्षा के लिए इस उत्सव की परंपरा शुरू की थी। समय के साथ यह राजवंशीय आयोजन जन-समाज का पर्व बन गया और आज भी बस्तर के गांव-गांव से जुड़ी देवी-देवताओं की भागीदारी के साथ मनाया जाता है।
यही कारण है कि बस्तर दशहरा को केवल धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
बस्तर दशहरा कहां मनाया जाता है?
बस्तर दशहरा (Bastar Dussehra) छत्तीसगढ़ का बस्तर जिला मे मनाया जाता है। इसका मुख्य केंद्र जगदलपुर शहर है, जहां मां दंतेश्वरी मंदिर और आसपास के क्षेत्र इस पर्व की मुख्य धार्मिक गतिविधियों से जुड़े रहते हैं।
हालांकि, यह केवल जगदलपुर तक सीमित नहीं है। बस्तर अंचल के कई गांवों और ग्रामीण इलाकों से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और पारंपरिक दल जुड़ते हैं। इसी वजह से यह पर्व पूरे क्षेत्र की साझी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है।
बस्तर दशहरा कब मनाया जाता है?
बस्तर दशहरा कब मनाया जाता है यह सवाल अक्सर पूछा जाता है, क्योंकि यह सामान्य दशहरे से बहुत पहले शुरू हो जाता है। यह उत्सव श्रावण मास की अमावस्या, जिसे हरियाली अमावस्या भी कहा जाता है, से शुरू होता है।
2026 में इसकी शुरुआत 12 अगस्त को पाट जात्रा के साथ हुई। इसका मुख्य दशहरा चरण 18 से 22 अक्टूबर के बीच चला, जबकि 20 अक्टूबर को भीतर रैनी की मुख्य रस्म निभाई गई। उत्सव का समापन 27 अक्टूबर 2026 को मुरिया दरबार के साथ होना बताया जाता है।
बस्तर दशहरा कितने दिन का होता है?
यह इस पर्व की सबसे चर्चित बात है। यह उत्सव लगभग 75 दिनों तक चलता है। कुछ परंपराओं और गणना के आधार पर इसे 76 दिन का भी बताया जाता है।
देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरा एक दिन का त्योहार होता है, लेकिन बस्तर में यह दो महीने से अधिक समय तक फैला रहता है। इस दौरान अलग-अलग रस्में, जात्राएं, पूजा-अनुष्ठान और सामुदायिक आयोजन होते हैं।
बस्तर दशहरा क्यों मनाया जाता है?
बस्तर दशहरा क्यों मनाया जाता है इसका उत्तर देश के बाकी हिस्सों की दशहरा परंपरा से अलग है। यहां इस पर्व का मुख्य उद्देश्य रावण-वध नहीं, बल्कि बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की पूजा और क्षेत्रीय देवी-देवताओं को सम्मान है।
मां दंतेश्वरी को बस्तर के लोगों की आराध्य देवी माना जाता है। उन्हें दुर्गा का स्वरूप माना जाता है और इसी आस्था के कारण बस्तर दशहरा देवी-शक्ति की उपासना से जुड़ा है।
यह पर्व किसानों, वनवासियों, कारीगरों, पुजारियों और ग्रामीण समाज के बीच साझा उत्सव का रूप ले लेता है। इसका उद्देश्य केवल पूजा नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक निरंतरता और क्षेत्रीय परंपराओं को आगे बढ़ाना भी है।
रावण दहन क्यों नहीं होता?
बस्तर दशहरे (Bastar Dussehre) की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। इसका कारण यह है कि यह उत्सव रामायण की रावण-वध कथा पर आधारित नहीं है। यहां दशहरे का केंद्र मां दंतेश्वरी, स्थानीय देवी-देवताओं और बस्तर की पारंपरिक मान्यताएं हैं। इसलिए रावण दहन की जगह देवी-दर्शन, जात्राएं, अनुष्ठान और सामुदायिक उत्सव को महत्व दिया जाता है।
यह बात इस त्योहार को भारत के अन्य दशहरा उत्सवों से अलग पहचान देती है।
पर्व की प्रमुख रस्में
बस्तर दशहरा केवल एक समारोह नहीं, बल्कि कई रस्मों की लंबी श्रृंखला है। इस दौरान एक से अधिक प्रमुख अनुष्ठान निभाए जाते हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
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पाट जात्रा: इसमें रथ और अनुष्ठानों के लिए पवित्र काठ लाने की परंपरा निभाई जाती है। यही से उत्सव की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है।
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काछिन गादी: इस रस्म के जरिए देवी से उत्सव शुरू करने की विधिवत अनुमति ली जाती है।
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रथ यात्रा और रथ परिक्रमा: देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को रथों में सजाकर नगर में जुलूस निकाला जाता है।
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मावली परघाव: इस रस्म में मां मावली का भव्य स्वागत किया जाता है।
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भीतर रैनी: यह उत्सव की मुख्य धार्मिक रस्मों में से एक है, जिसे 2026 में 20 अक्टूबर को मनाया गया।
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मुरिया दरबार: यह उत्सव के अंतिम चरण से जुड़ा आयोजन है, जिसमें समाज की भागीदारी विशेष रूप से देखने को मिलती है।
यह आदिवासी संस्कृति का जीवंत उत्सव है
बस्तर दशहरा (Bastar Dussehra) की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें लोक संस्कृति केवल प्रदर्शन भर नहीं है, बल्कि जीवन का हिस्सा है। यहां गांव के देवी-देवता, पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत, नृत्य, पूजा-विधियां और सामूहिक भोज जैसी परंपराएं एक साथ जुड़ती हैं।
यह उत्सव बस्तर के आदिवासी समाज की आत्मनिर्भरता और सामूहिक भागीदारी को भी दर्शाता है। रस्मों में ग्रामीण, पुजारी, युवा और बुजुर्ग—सभी की भूमिका होती है। इसीलिए यह पर्व पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहा है।
इसका पर्यटन और सांस्कृतिक महत्व
बस्तर दशहरा देश-विदेश के पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। जगदलपुर और आसपास के इलाकों में इस दौरान सांस्कृतिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं और लोग बस्तर की अनूठी परंपराओं को करीब से देखने आते हैं।
यह उत्सव छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाता है। साथ ही यह स्थानीय कारीगरों, कलाकारों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर बन जाता है।
बस्तर दशहरा क्यों अनोखा है?
बस्तर दशहरा (Bastar Dussehra) को अनोखा इसलिए माना जाता है क्योंकि यह तीन बातों में अलग है—इसकी अवधि, इसका धार्मिक आधार और इसकी सामुदायिक प्रकृति। यह 75 दिनों तक चलता है, रावण दहन नहीं होता और इसका केंद्र मां दंतेश्वरी की आराधना है।
यह पर्व यह भी दिखाता है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता कितनी गहरी है। एक ही त्योहार के नाम पर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताएं, रीति-रिवाज और उत्सव के तरीके विकसित हो सकते हैं।
NOTE: यह लेख सामान्य जानकारी और सांस्कृतिक शिक्षा के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। बस्तर दशहरा की तिथियां, रस्में और स्थानीय मान्यताएं क्षेत्र, परंपरा और वर्ष के अनुसार बदल सकती हैं। किसी भी आयोजन या यात्रा से पहले स्थानीय प्रशासन, मंदिर समिति या आधिकारिक स्रोतों से नवीनतम जानकारी अवश्य जांच लें।


