जजों की नियुक्ति कैसे होती है, इस सवाल पर देश में बहस पुरानी है। लेकिन इस हफ्ते यह फिर सुर्खियों में है। वजह है राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (National Judicial Appointments Commission), जिसे आम बोलचाल में NJAC कहा जाता है। इसे रद्द हुए 16 अक्टूबर को पूरे 11 साल हो जाएंगे, और उससे ठीक पहले चेन्नई में हुए एक कार्यक्रम में पूर्व जजों ने इस मुद्दे पर खुलकर बात की। इस लेख में हम सीधी, सरल भाषा में समझेंगे कि मामला क्या है।
जानिए ताज़ा खबर: चेन्नई में क्या कहा गया
शनिवार, 10 अक्टूबर को चेन्नई में एक चर्चा सभा हुई। इसमें पूर्व मद्रास हाईकोर्ट जज के. चंद्रू की किताब “Who Will Judge the Judges” पर बात हुई। इसी कार्यक्रम में उड़ीसा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर ने कहा कि मई 2014 के बाद से जजों की नियुक्ति पर सरकार की पकड़ मजबूत हुई है, जबकि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को सुप्रीम कोर्ट पहले ही रद्द कर चुका था।
उन्होंने एक उदाहरण भी दिया। 2018 में जस्टिस के.एम. जोसेफ और वरिष्ठ वकील इंदु मल्होत्रा के नाम एक ही प्रस्ताव में भेजे गए थे, लेकिन इंदु मल्होत्रा की नियुक्ति मंजूर हो गई और जस्टिस जोसेफ का नाम महीनों तक रोके रखा गया। उनके मुताबिक सरकार बिना संविधान बदले भी इस प्रक्रिया पर असर डाल सकती है।
जस्टिस चंद्रू का तर्क और तीखा था। उन्होंने कहा कि सरकार ने 2014 में आयोग लाने की कोशिश की, लेकिन उसके रद्द होने के बाद संसद में नया संशोधन नहीं लाई। यह उनकी अपनी राय है, और सरकार का पक्ष इस मामले में अलग हो सकता है।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) आयोग क्या है?
अब बुनियादी सवाल पर आते हैं। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग क्या है? यह एक ऐसी संस्था थी जिसे बनाने का फैसला संसद ने 2014 में किया था। इसका मकसद था सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति का तरीका बदलना।
उस समय और आज भी, जजों को चुनने का काम कॉलेजियम व्यवस्था करती है, जिसमें वरिष्ठ जज ही अगले जजों के नाम तय करते हैं। सरकार चाहती थी कि इस काम में सिर्फ जज नहीं, बल्कि कार्यपालिका और समाज के जाने-माने लोग भी शामिल हों।
इसके लिए दो कानून बने। लोकसभा और राज्यसभा ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक 2014 और संविधान (121वां संशोधन) विधेयक पास किया, और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 31 दिसंबर 2014 को उन्हें मंजूरी दी। ये कानून 13 अप्रैल 2015 से लागू हुए। इसी के साथ संविधान में एक नया अनुच्छेद 124A जोड़ा गया, जिसमें आयोग की बनावट बताई गई थी।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का कौन-कौन होता सदस्य?
अगर आप हिन्दी में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की संरचना समझना चाहते हैं, तो इसमें छह सदस्य होने थे:
- भारत के मुख्य न्यायाधीश, जो अध्यक्ष रहते
- सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जज
- केंद्रीय कानून मंत्री
- दो प्रतिष्ठित व्यक्ति, जिन्हें प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की समिति चुनती
इनमें से एक प्रतिष्ठित सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक या महिला वर्ग से होना जरूरी था। यानी जजों की संख्या तीन और बाकी तीन सदस्य न्यायपालिका के बाहर के।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के कार्य
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के कार्य मोटे तौर पर चार हिस्सों में बंटे थे।
पहला, यह भारत के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम राष्ट्रपति को सुझाता। दूसरा, यह हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों और जजों के नाम तय करता। तीसरा, यह हाईकोर्ट के जजों और मुख्य न्यायाधीशों के तबादले की सिफारिश करता। चौथा, यह देखता कि जिस व्यक्ति का नाम बढ़ाया जा रहा है, उसकी योग्यता और ईमानदारी ठीक है या नहीं।
आसान शब्दों में कहें तो आयोग को जजों की “चयन समिति” बनना था। फर्क बस इतना था कि कॉलेजियम में सिर्फ जज बैठते हैं, जबकि इस आयोग में बाहर के लोग भी बराबर की आवाज रखते।
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने इसे क्यों रद्द किया?
यह कानून ज्यादा दिन नहीं चला। 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की संविधान पीठ ने इसे असंवैधानिक करार दिया। यह फैसला 4:1 के बहुमत से आया, और अदालत ने कहा कि आयोग न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है।
सबसे बड़ी आपत्ति “वीटो” को लेकर थी। छह सदस्यों वाले आयोग में कोई भी दो सदस्य किसी नियुक्ति को रोक सकते थे, जिससे मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रपति की राय भी किनारे हो सकती थी। इसके अलावा बहुमत की राय में कानून मंत्री और गैर-न्यायिक सदस्यों को मिली यह ताकत न्यायपालिका की प्राथमिकता को कमजोर करती थी, जो संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है।
यानी अदालत का तर्क सीधा था। अगर जजों की नियुक्ति में सरकार का दखल बढ़ गया, तो वही सरकार, जो अदालत में सबसे बड़ी पक्षकार होती है, जजों को चुनने में भी असर डाल सकती है।
कॉलेजियम पर भी उठते रहे हैं सवाल
NJAC रद्द हो गया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कॉलेजियम व्यवस्था को सब ठीक मानते हैं। इस पर पारदर्शिता की कमी का आरोप बार-बार लगता रहा है। अगस्त 2026 में खुद सुप्रीम कोर्ट के जज उज्जल भुइयां ने इस व्यवस्था की आलोचना की। उनका कहना था कि नियुक्तियों के कारण न बताना न्यायपालिका के साथ अन्याय है।
जस्टिस मुरलीधर ने भी कहा कि कई मुख्य न्यायाधीशों से जुड़े विवादों ने कॉलेजियम को कमजोर किया है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश के पास “मास्टर ऑफ द रोस्टर” की शक्ति, यानी यह तय करने का अधिकार कि कौन-सा जज कौन-सा केस सुनेगा, पर भी चिंता जताई।
दोनों पक्षों की बात
इस बहस में दोनों तरफ ठोस तर्क हैं।
आयोग के पक्ष में कहा जाता है: जजों का खुद को चुनना दुनिया में बहुत कम जगह होता है। जस्टिस चंद्रू ने भी यही कहा कि कहीं भी जज खुद को नियुक्त नहीं करते। लोकतंत्र में जवाबदेही जरूरी है, और बाहर के सदस्य इसमें मदद कर सकते थे। संघर्ष लंबा खिंचा तो पद खाली रहे, और अदालतों में मामले अटके।
आयोग के खिलाफ कहा जाता है: जजों को सरकार से दूर रखना ही निष्पक्ष न्याय की पहली शर्त है। अगर कार्यपालिका को नियुक्तियों में वीटो मिला, तो आम नागरिक को सरकार के खिलाफ इंसाफ मिलना मुश्किल हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी वजह से इसे खारिज किया।
सच यह है कि दोनों बातों में वजन है, और समाधान शायद बीच में कहीं है।
फिलहाल सरकार की तरफ से नया आयोग लाने का कोई ऐलान नहीं दिखता, और जिन लोगों ने यह बहस छेड़ी है, वे ज्यादातर सेवानिवृत्त जज और विशेषज्ञ हैं। फिर भी जब भी कोई बड़ा विवाद उठता है, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का नाम वापस चर्चा में आ जाता है।
अगर कभी नया कानून आए, तो उसे संविधान में संशोधन करके लाना होगा, और वह सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा। यानी रास्ता लंबा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग क्या है?
यह जजों की नियुक्ति के लिए बनाया गया एक छह सदस्यीय आयोग था, जो कॉलेजियम की जगह लेने वाला था। इसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कब रद्द हुआ?
16 अक्टूबर 2015 को, 4:1 के बहुमत से।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के कार्य क्या थे?
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के नाम सुझाना, तबादलों की सिफारिश करना और उम्मीदवारों की योग्यता व ईमानदारी जांचना।
अभी जजों की नियुक्ति कौन करता है?
कॉलेजियम व्यवस्था के जरिए, जिसकी सिफारिश पर राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं।
निष्कर्ष:
जजों की नियुक्ति कौन करे, यह सवाल सीधा लगता है, लेकिन इसमें दो बड़े सिद्धांत टकराते हैं: न्यायपालिका की आजादी और लोकतांत्रिक जवाबदेही। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग इसी टकराव की सबसे बड़ी मिसाल था। 11 साल बाद भी बहस थमी नहीं है, और शायद तब तक नहीं थमेगी जब तक कोई ऐसा रास्ता न मिले जिसमें पारदर्शिता भी हो और आजादी भी।
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