अमेरिका और ईरान के रिश्तों में एक बार फिर खटास बढ़ती नजर आ रही है। ताजा विवाद की जड़ है होर्मुज जल डमरू मध्य दुनिया का वह समुद्री रास्ता जिससे रोजाना लाखों बैरल कच्चा तेल गुजरता है और जिसे संसार की वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। ईरान की तरफ से इस इलाके को लेकर एक प्रस्ताव रखा गया था, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बिना किसी सोचे समझे खारिज कर दिया।
यह फैसला अचानक नहीं आया। पिछले कुछ महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच बयानबाजी लगातार तीखी होती जा रही थी, और होर्मुज को लेकर हर छोटा-बड़ा फैसला दोनों देशों के बीच तनाव का कारण बन चुका है। जानकारों का कहना है कि यह इलाका इतना संवेदनशील है कि यहां की एक छोटी सी घटना भी वैश्विक तेल कीमतों पर सीधा असर डाल सकती है।
ट्रंप प्रशासन का रुख साफ दिख रहा है वह इस मामले में किसी तरह की नरमी दिखाने के मूड में नहीं है। दूसरी तरफ ईरान की सरकार ने भी अभी तक इस इनकार पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन कूटनीतिक हलकों में यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि आने वाले दिनों में तेहरान की तरफ से भी सख्त बयान आ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा। खाड़ी क्षेत्र में मौजूद बाकी देश, खासकर सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे तेल उत्पादक राष्ट्र भी इस स्थिति पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं। अगर तनाव और बढ़ता है, तो इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है, जो आगे चलकर भारत जैसे तेल आयातक देशों की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है।
भारत के लिए यह स्थिति खास तौर पर अहम है क्योंकि हमारा एक बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी तरह की रुकावट आती है, तो इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है, जिससे आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अभी स्थिति पूरी तरह अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि आने वाले हफ्तों में यह तनाव किस दिशा में जाएगा बातचीत की टेबल तक पहुंचेगा या और बढ़ेगा। लेकिन इतना तय है कि दुनिया भर की सरकारें और बाजार इस मुद्दे पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं।
फिलहाल के लिए इतना समझना जरूरी है कि यह सिर्फ दो देशों के बीच की तनातनी नहीं, बल्कि एक ऐसा मसला है जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति तीनों पर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और स्पष्टता आने की उम्मीद है, और तब तक दुनिया भर की निगाहें वाशिंगटन और तेहरान के बीच होने वाले हर छोटे-बड़े बयान पर टिकी रहेंगी।